एक तरफ RTA कहता है कि शहर में ऑटो ट्रैफिक जाम कर रहे हैं,
और दूसरी तरफ उसी हल्द्वानी शहर में लगभग 90 बसों को लाने की तैयारी हो रही है — ये कहकर कि “इंटर-सिटी कनेक्टिविटी बेहतर करनी है।”
सवाल सीधा है —
और सबसे बड़ी बात —
ये इंटर-सिटी सेवा कोई सरकारी नहीं, बल्कि निजी हाथों में दी जा रही है।
लोग सवाल पूछ रहे हैं — क्या ये फैसले जनहित में हैं या किसी खास हित में?
दूसरी तरफ, 500 ऑटो को व्यवस्थित रूप से एग्रीगेटर मॉडल में लाने की बात आती है,
तो सिस्टम के पास 1000 बहाने हैं।
और irony देखिए —
अब तक लोग चुप थे… क्योंकि कम से कम सेवा तो मिल रही थी।
लेकिन अब सवाल उठना जरूरी है।
दीप चन्द्र पांडे जैसे लोग, जिन्होंने सभी नियमों का पालन किया,
जिन्हें नवंबर 2024 में लाइसेंस मिला —
वो आज तक सड़क पर उतर नहीं पाए।
क्यों?
सबसे दुखद सच्चाई यह है —
RTA Rapido जैसी बड़ी कंपनियों पर नहीं,
बल्कि छोटे ड्राइवरों पर कार्रवाई करने में ज्यादा सक्रिय दिखता है।
गरीब और मिडिल क्लास ड्राइवर ही पिसेंगे
और बड़े प्लेटफॉर्म्स पर कोई असर नहीं पड़ेगा
और इसका अंतिम परिणाम यह होगा कि नागरिकों को परिवहन सेवा नहीं मिलेगी।
यह सिर्फ ट्रांसपोर्ट का मुद्दा नहीं है —
यह न्याय, समान अवसर और सिस्टम की नीयत का सवाल है।
अब समय आ गया है —
या तो सिस्टम बदले
या फिर सिस्टम को बदलना पड़ेगा,
सिस्टम के मुख्य निर्णय निर्माता बदले जाएं
क्या हल्द्वानी में नियम सबके लिए बराबर हैं?
गलती सिस्टम की है या सोच की?
