नैनीताल/हल्द्वानी। नया शैक्षिक सत्र 2026-27 शुरू होते ही नैनीताल जिले के निजी स्कूलों में सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़नी शुरू हो गई हैं। मेरे पास मौजूद RTI (सूचना का अधिकार) के आधिकारिक दस्तावेज़ (पत्रांक 7491-75) चीख-चीख कर कह रहे हैं कि ‘पुनः प्रवेश शुल्क’ (Re-admission Fee) पूरी तरह प्रतिबंधित है, NCERT किताबें अनिवार्य हैं और किसी खास दुकान से यूनिफॉर्म खरीदने के लिए पेरेंट्स को मजबूर नहीं किया जा सकता।
लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई इसे मान रहा है?
पिछले साल का कड़वा सच: पिछले साल भी करीब 40 स्कूलों को नियमों के उल्लंघन का दोषी पाया गया था। उस वक्त मामला हाईकोर्ट तक पहुँचा था। तब मुख्य शिक्षा अधिकारी (CEO), नैनीताल और CBSE के जिम्मेदार अधिकारियों ने यह भरोसा दिलाया था कि भविष्य में ऐसी धांधली नहीं होगी क्योंकि राज्य में एक शक्तिशाली ‘स्टेट एजुकेशन एडवाइजरी’ (State Education Advisory) टीम काम कर रही है।
जनता का अधिकारियों से सीधा सवाल: इस साल फिर वही लूट, वही लंबी लाइनें और वही मनमानी फीस शुरू हो गई है। तो क्या वह ‘एडवाइजरी टीम’ सिर्फ कागजों पर ही बनी है? क्या अधिकारियों की सख्ती सिर्फ लेटर जारी करने तक सीमित है?
हमारी मांग – जवाबदेही तय हो: अगर इस बार भी धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो हमें सरकार और माननीय उच्च न्यायालय (High Court) से क्या मांग करनी चाहिए?
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सिर्फ ट्रांसफर काफी नहीं: क्या कर्तव्य की अनदेखी (Dereliction of Duty) के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी विभागीय कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?
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आर्थिक जवाबदेही (Financial Liability): अगर प्रशासन स्कूलों को लूटने से नहीं रोक पा रहा, तो क्या अधिकारियों को उस ‘लूट’ की भरपाई अपनी जेब से नहीं करनी चाहिए?
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मान्यता रद्द हो: आदेश में साफ लिखा है कि नियम तोड़ने पर मान्यता (Recognition) रद्द की जाएगी। तो आज तक एक भी स्कूल का लाइसेंस रद्द क्यों नहीं हुआ?
चेतावनी: हम शांत बैठने वाले नहीं हैं। अगर विभाग अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाएगा, तो इस बार माननीय उच्च न्यायालय में प्रशासन की इस ‘निष्क्रियता’ (Inaction) को चुनौती दी जाएगी।
जागो पेरेंट्स जागो! अपनी आवाज उठाएं।
साभार: दीप चंद्र पाण्डे
Ground Truth India Media Network
